आए दिन हो बंम के धमाके जनता मर मर जाए।नित नये वादे कर कर के ये जनता को भरमाए।कोई चारा खा कर बैठा , जरा नही शर्माए ।कोई जवानों के कफनों पर, बैठ कमीशन खाए।इनकी बला से भाड़ मे जाए देश की जनता सारी।इन को बस कुर्सी ही है , भाया ! सब से प्यारी ।रंगें सियार सभी यहाँ हैं, क्या जनता करे बेचारी।मुखिया प्यारे शर्म आ रही, देख तेरी सरदारी।जरा सोचकर देखो भाया! कुर्सी किसने दी है।देशकी भोली जनता की, कब कब किसने ली है।जनता...
Sunday, November 30, 2008
Saturday, March 8, 2008
सामना की खबर पर ढं ढोरची का जोड-तोड
पर
Saturday, March 08, 2008
1 टिप्पणियाँ
भाया!जब भी देश वासी तुम्हें भाव देना कम कर दे या चुनाव का मौसम आ जाए,तो कुछ ऐसा उछाल मारों की सभी डु्गडुगी सुन कर तुम्हारे आस पास मजमा लगा लें। ऐसे समय में अगर तुम्हें मदारी बनना पड़े तो गुरेज़ मत करों ।भले ही तुम्हारे कहे से देश का बंटाधार होता हो तो होनें दो...किसी का सिर फूटता है तो फूटनें दो...कुर्सी के पानें के लिए वह अपना ही सिर फोड़ सकते हैं तो तुम्हारे सिर फूटनें की किसी को क्या परवाह! इतिहास गवाह है इस कुर्सी के लिए...
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