Wednesday, January 9, 2008

ढंढोरची की मधुशाला

1 टिप्पणियाँ

यदि किसी को मेरी यह रचना आहत करे तो माफी चाहूँगा....................



बना बेवकूफ ढूंढ रहा था मिल जाए बस कुछ हाला,

बच्चें-बीबी भूखे मर जाएं, मुझ को तो चाहिए प्याला,

मुझे ठहरनें को यारों, परेशान नही होना पड़ता,

मिले ना घर,मिले ना दुकान,मिल जाता है गंदा नाला।




अम्मां निसि -दिन गाली देती,खफा रहे मुझ से खाला,

लड़-भिड़ निति घर से आता,पीट बीबी को, पीनेंवाला,

भाया!कैसे तुलना हो,खड़े रहना जिसको मुश्किल हो,

बेसुध-सा कहीं पड़ा जमीं पर,देखे सपना जन्नत वाला।




बदबू मुहँ में,गाली काडे,आनें-जानें वालो को लाला,

सरे बजार निति पिटता है,बेसुध ये पिटनेवाला,

जूते खा कर भी मस्ती में,झूम रहा पीनें वाला,

पता नही कितनें घरों को,बर्बाद करे है मधुशाला।




1 टिप्पणियाँ:

महेंद्र मिश्रा says:
January 9, 2008 at 8:20:00 PM GMT+5:30

बहुत खूब वाह

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