बहुत जतन से लिख रहे चिट्ठा यारों हम।
हिट देख बुरा हाल है, जीरो से भी कम।
जीरो से भी कम, हमे पढ़्ता नही कोई,
हँसते-हँसते यारो, अपनी आँखे रोई।
मन की बात बोलने मे क्या जाता है....
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4 टिप्पणियाँ:
July 26, 2007 at 3:07:00 AM GMT+5:30
अरे, महारज. लिखते रहें, हम पढ़ रहे हैं न!!
July 26, 2007 at 6:26:00 AM GMT+5:30
हम भी पढते रहे हैं जी आपको..पर अन चिन्ह भी छोड़ जायेंगे...आप लिखते रहे...अच्छा लिखते है जी.
July 26, 2007 at 1:48:00 PM GMT+5:30
ठीक है जी. मुनादी हो गयी. अब उसी के माफिक लिखते रहें. :)
July 31, 2007 at 6:13:00 PM GMT+5:30
गजब का हास्य ठूसा है 4 पंक्तियों मे. लिखते रहें -- शास्त्री जे सी फिलिप
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
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